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क्ष्री लेखराम - वीर तृतीया

फाल्गुन शुदि तृतीया
( ६ मार्च )
संसार भावमय है | संसार केवल भाव का प्रसार है | भाव ही संसार में शासन करते हैं मानव मन मे प्रथम भाव का ही आविर्भाव होता है | उनके अनुसार ही वह क्रिया में प्रवृत्त होता है | साधारण मनुष्यों के मानससरोवर में भावों के अविर्भाव - तिरोभाव की तरंगे सदा उठती रहती हैं | उनके बहुत से भाव दरिद्रों के मनोरथों के समान उत्पन्न होते ही विलीन हो जाते हैं , किन्तु महाशयों के भाव कार्य में परिणत हुए बिना नहीं रहते | महापुरुषों के भाव तो संसार में हलचल मचा देते है | जगत के बडी बडी क्रान्तियों के कारण महापुरुषों के भाव ही हुए है | संसार के सभी मतमतान्तर महापुरुषों के विविध भावों के ही प्रपन्च है | जब किसी महापुरुष के हृदय पर किसी भाव का बल पूर्वक आघात होता है , तभी वह संसार मे प्रचार पता है और किसी विशेष मत का रूप धारण करता है |नाना मतों की संस्थापना की यह प्रक्रिया और यही इतिहास है , किन्तु भावों के आघात या प्रतिघात का प्रभाव भावुक हृदयों पर ही चिरस्थाई होता है और इसलिए संसार मे जितने परिवर्तन , विप्लव , क्रान्तियां हुई हैं , वे सब महापुरुषों व्दारा ही हुई है जन साधारण ऐसे भावुक महापुरुषों को उन्मत्त या पागल कहकर हंसता है और वे वस्तुतः अपनी धुन मे उन्मत्त वा मस्त रहते हैं | संसार के इतिहास को बनाने वाले विविध धर्मों के संस्थापक अपने विचारों के पीछे पागल बने हुए अपनी धुन के पक्के ऐसे ही उन्मत्त महानुभाव थे | यदि धर्म संस्थापकों की जीवनियों का मनन किया जाय तो यह विशेसता उन सब में सामान्य रुप से उपलब्ध होगी | बुद्ध , ईसा , मोहम्मद , कबीर , दयानन्द , गांधी सभी अपने विचारों के प्रसार में उन्मत्त प्रतीत होंगे उनके सिद्धान्तों का प्रसार भी संसार मे अनेक भावुक अनुयायियों के व्दारा ही हुआ हैं बुद्ध के आनन्द आदि प्रमुख भिक्षु , ईसा , के पीटर आदि शिष्य , मोहम्म्द के अत्युत्साही अली और उमर आदि खलीफा इसके उत्त्म उदाहरण हैं |
आज इस शताब्दी के अव्दितीय धर्मसंस्थापक , आर्य समाज के आचर्य महर्षि दयानन्द के एक ऐसे ही भावुक शिष्य अविक्ष्रन्त धर्म प्रचारक के पवित्र चरित्र की पर्यालोचना का प्रसंग प्राप्त है |
आर्यसमाज के परिचित मण्डल मे तो कोई भी ऐसा व्यक्ति न होगा जो धर्मवीर पं० लेखराम आर्यपथिक के नाम और काम को न जानता हो , किन्तु आर्य समाज से बाहर भी करोडों मनुष्य पं० लेखरम के नाम से परिचित हैं | पं० लेखराम की भावुकता ही सर्वसाधारण मे उनके इस परिचय की मूल कारण बनी थी | वैसे तो वे पंजाब के झेलम जिले के एक अप्रसिद्ध ग्राम सैदपुर के एक अप्रसिद्ध सारस्वत ब्रह्मण कुल में जन्मे थे , परन्तु उनमे अपने पितृकुल की सैनिकवृत्ति से आया हुआ शरीर का संगठन तथा क्षात्रतेज का कुछ अंश भी अवश्य विद्दमान था | उनके पितामह महता नारायण सिंह पंजाब के सिक्खकालीन विप्लव के वीर योद्धा थे और कई संग्रामों मे अपने हाथ दिखा चुके थे | उन्ही महता नारायण सिंह के पुत्र महता तारा सिंह हुए , जिनके पुत्र पं० लेखराम का जन्म ८ सौर चैत्र संवत १९१५ विक्रमी को शुक्र के दिन उक्त सैदपुर ग्राम में हुआ था |
वे बाल्यकाल से ही भावुक तथा धार्मिक थे | अपने चाचा पं० गण्डाराम जी को एकदशी का व्रत करते देखकर बालक लेखराम ने ११ वर्ष की अवश्था में बडी क्ष्रद्धा से एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखना आरम्भ कर दिया था | उनको बाल्य काल में केवल उर्दू - फारसी की शिक्षा मिली थी , क्योंकि उस समय पंजाब और संयुक्त प्रान्त में उसी के पढने की परिपाटी प्रचलित थी | यह शिक्षा आगे चलकर उनके मोहम्मदी मत की आलोचना करने मे बहुत सहायक हुई | उनके विद्यार्थी जीवन में केवल यही बात उल्लेख योग्य है कि वे तब भी स्वतन्त्रताप्रिय , प्रत्युत्पन्नमति तथा तत्कालिक प्रत्युत्तरप्रवीण थे और कविता की ओर भी उनका कुछ झुकाव था |
संवत १९३२ वि० के पौष मास में वे अपने चाचा पण्डित गण्डाराम इन्स्पेक्टर पुलिस की सहायता से पेशावर पुलिस मे सारजेन्ट के पद पर नियुक्त हो गये | ऊपर बताया जा चुका है कि पं० लेखराम के बालहृदय में ही भावुकता तथा धार्मिकता का अंकुर विद्दमान था | धार्मिक सिख सिपाही के सत्संग से उनकी प्रवृत्ति पूजा पाठ में किशोरावस्था से ही हो चुकी थी | वे प्रातः काल स्नान - ध्यान में निमग्र रहते और गुरुमुखी में लिपिवद्ध भगवद्गीता का पाठ किया करते थे | क्ष्रीकृष्ण की भक्ति में तन्मय रहते थे | जीव ब्रह्म की एकता के विश्वासी और वैराग्यप्रवण थे | २१ वर्ष की अवस्था मे उनके माता पिता ने उनको विवाह बन्धन मे आबाद्ध करना चाहा , पर उन्होने अपने वैराग्यवश उस को स्वीकार न किया | उन की धर्म जिग्याशा दिन प्रतिदिन बढती ही गई | उन्ही दिनों उनको लुधियाना के प्रसिद्ध स्वतंत्रविचारक मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी के ग्रन्थ पढने का अवसर मिला |अलख धारी जी के ग्रन्थों से उनको ऋषि दयानन्द के आर्य धर्म प्रचार और आर्य समाज की स्थापना का वृत्तान्त ग्यात हुआ और उन्होने डाक व्दारा ऋषि दयानन्द प्रणीत ग्रन्थों को माग कर पढना सुरु किया | इससे उनके विचार सर्वथा बदल गए और वे आर्य बन गए घटना क्रम की कैसी विलक्षण समानता है कि पं० लेखराम जी के समान इन पंक्तियो के लेखक का भी विचार प्रवाह मुंशी कन्हैयालाल जी अलखधारी की पुस्तकों व्दारा ही आर्यसमाज और उसके आचार्य के ग्रन्थों की ओर फिरा था , किन्तु जुगनू और सुर्य में क्या साम्य हो सकता है ? पण्डित लेखराम की की शुद्धि और भावुकप्रकृत ने उनको ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से प्रभावित करके धर्मवीर आर्यपथिक बना दिया और यह चिकना घडा वैसे का वैसा विद्दमान है |
वैदिक धर्मावलम्बी बनकर पं० लेखराम ने संवत १९३६ वि० के अन्तिम भाग में सीमाप्रन्त के यवनप्रायः पेशावर नगर मे आर्यसमाज की स्थापना की थी | उस समय पेसावर आर्यसमाज के सर्वेसर्वा वे ही थे | वे और उनके पंच साथियों से ही पेशावर आर्यसमाज संगठित था | पं० लेख्राम के मन मे जीव ब्रह्मा की एकता आदि के विषय मे कुछ शंकायें उस समय तक बनी हुई थी | उन की निवृत्ति के लिए उन्होने आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द के स्वयं दर्शन करने का निश्चय किया और साढे चार वर्ष की नौकरी के पश्चात एक मास की छुट्टी लेकर १७ मई सन १८८० ई० (सं० १९३६ वि०) को अजमेर पहुचकर सेठ फतहमल जी की वाटिका मे ठहरे हुए ऋषि दयानन्द के प्रथम और अन्तिम बार दर्शन किए | इस समागम का वृत्तान्त उन्होने स्वयं इस प्रकार दिया है -
स्वामी दयानन्द के दर्शन से यात्रा के सारे कष्ट विश्मृत हो गये और उनके सत्योपदेश से सब संसय निवृत हो गये | उन्होने महर्षि से उन से जय पुर मे एक बन्गाली की उपस्थिति की हुई यह शंका पूछी कि जब आकाश और ब्रह्मा दोनो सर्वव्यापक है तो दो व्यापक एक स्थान पर कैसे रह सकते है ? महर्षि दयानन्द ने एक पत्थर उठा कर कहा कि जिस प्रकार इस मे अग्नि , मिट्टी और परमात्मा तीनो व्यापक है | उसी प्रकार ब्रम्हाण्ड मे आकाश और ब्रह्मा दोनो व्यापक है | सूक्ष्म वस्तु में उस से भी सूक्ष्मतर वस्तु व्यापक रहती है | ब्रह्मा सूक्ष्मतर होने के कारण सर्वव्यापक है | लेखरामजी लिखते है कि " इस से मेरी शान्ति हो गई |" उन्होने महर्षि के अन्य संशय उपस्थित करने की आग्या देने पर उन से दस प्रश्न पूछे थे | उन मे से तीन उन्होने उत्तर सहित स्वयं लिखे है | शेष उनको विस्मृत हो गये थे |
प्रथम प्रश्न - " जीव ब्रह्मा की भिन्नता में कोई वेद का प्रमाण बतलाइए |"
उत्तर - " यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय जीव और ब्रह्मा का भेद बतलाता है |"
व्दितीय प्रश्न - " अन्य मतो के मनुष्यों को शुद्ध करना चाहिए वा नहीं ?"
उत्तर - " अवश्य शुद्ध करना चाहिए |"
तृतीय प्रश्न - " विद्दुत क्या वस्तु है और कैसे उत्पन्न होती है ?"
उत्तर - " विद्दुत सब स्थानों मे है और रगड से पैदा होती है | बादलों की विद्दुत भी बादलों और वायु की रगड से पैदा होती है |"
अन्त मे मुझे आदेश दिया कि " २५ वर्ष की आयु से पूर्व विवाह न करना |" ऋषि दयानन्द के स्वल्प सत्संग से पं० लेखराम के धार्मिक विचार दृढ हो गए और वैदिक धर्म पर उनका विश्वास चट्टान के समान अटल हो गया |
अजमेर से लौट कर उनको दिन रात धर्म प्रचार की ही धुन लगी रहती थी उन्होने पेशावर आर्य समाज की ओर से अपने सम्पादान में " धर्मोपदेशक " नामक उर्दू का मासिक पत्र जारी कराया | उसके साथ ही मौखिक व्याख्यान भी प्रायः देते रहते थे | कुछ दिनो पश्चात उनकी बदली पेशावर से अन्य पुलिस स्टेशनों को हो गई | उन की धार्मिक लगन के कारण उनके विधर्मी अफसर उनसे मनोमालिन्य रखने लगे थे | उधर पं० लेखराम की स्वतन्त्र आत्मा विगर्हित श्ववृत्ति से दिनो दिन खिन्न होती जाती थी | अन्त मे उन्होने २४ जुलाई सन १८७४ ( सं० १९४१ वै० ) की सदा स्मरणीय तिथि को पुलिस की सेवा से त्याग पत्र दे दिया और इसमे यह भी लिख दिया कि दो महीने की कानूनी मियाद के पश्चात मुझ को रोकने का अधिकार किसी को भी न होगा | दो महीने पस्चात ३० दितम्बर सन १८८४ ई० ( सं० १९३१ वै० ) को उन्होने मनुष्यो दासत्व से सदा के लिए मोक्ष लाभ किया | इस दासत्व - क्ष्र्रृङ्ख्ला के कटते ही सारजेन्ट लेखराम , पं० लेखराम बन गए | अब वे दिन रात आर्य धर्म के प्रचार मे रत रहने लगे | एक ओर वे वैदिक धर्म के विरोधियों की आक्षेपपुर्ण पुस्तकों के उत्तर लिखने मे संलग्न रहते थे तो दूसरी ओर मौखिक प्रचारार्थ बराबर पर्यटन करते रहते थे | इस अहर्निश की यात्रा के कारण उनका नाम " आर्य मुसाफिर " आर्य यात्री वा आर्य पथिक प्रसिद्ध हो गया और आर्य जनता मे " आर्य पथिक पं० लेखराम " के नाम से विख्यात हो गए |
उन लेख बद्ध प्रचार वा पुस्तक प्रणयन का सुत्रपात उनके मुसलमानों के अहमदिया सम्प्रदाय के प्रवर्तक कादियान जिला गुरुदासपुर निवासी मिरजा गुलाम अहमद कादियानी के साथ संघर्ष से हुआ था | उक्त मिरजा ने एक पुस्तक " बुराहीन ए - अहमदिया " लिखी थी , जिसमे आर्य समाज पर बडे कटु आक्षेप किये गए थे | पं० लेखराम ने उन के उत्तर मे अकाट्य तर्क पूर्ण ' तक जीव बुराहीन ए - अहमदिया ' ग्रन्थ लिखा | फिर मिरजा ने अनुचित आक्रमणों से परिपूर्ण ' सुर्म ए - चश्म से परिपूर्ण आरिया ' लिखा जिसके उत्तर मे पं० लेखराम ने युक्तियों के जाल से परिपूर्ण ' नुस्ख ए - खब्त अहमदिया ' प्रणीत किया | मिरजा ने घोषणा की थी कि मेरे पास ईश्वर के दूत सन्देश लाते हैं और मैं अलौकिक चमत्कार दिखलासकता हूं तथा जिस मनुष्य की मृत्यु के लिए मै ईश्वर से प्रार्थना करुंगा , वह मनुष्य एक वर्ष के भीतर मर जायेगा यदि मैं ये दोनो कार्य न कर सकूं , तो मै कादियान में अपने पास रहकर उनकी परीक्षा करने वाले मनुष्य को २००/- मासिक की दर से २४००/- दूंगा | पं० लेखराम ने उनके इस आह्वाहन को स्वीकार करके उसकी परीक्षा करनी चाही और उसको २४००/- जमा कर देने को लिखा , किन्तु उसने नाना प्रकार के बहाने बनाकर टाल दिया | पं० लेखराम ने स्वयं कादियान पहुंचकर मिरजा से मौखिक विवाद किया , जिसमे वह निरुत्तर हो गया | जनता मे उसके हेत्वाभासों और चमत्कारों की पोल खुल गई और उस के बहुत से अनुयायियों पर से उसका प्रभाव उठ गया | मिरजा से पं० लेखराम का यह संघर्ष दिन प्रतिदिन बढता ही गया और उस ने ऐसा भयंकर रूप धारण किया कि अन्त में पं० लेखराम इसी की बली हो गये |
पं० लेखराम मे वैदिक धर्म की रक्षा और उसके प्रचार का उत्साह इतना उत्कट था कि वे जहां कहीं भी किसी के वैदिक धर्म - त्याग व शास्त्रार्थ के समाचार सुनते तो सौ काम छोड कर बिजली के समान वहीं पहुचते थे और भूले हुए भाई को बचाने मे अपनी सारी शक्ति लगा देते थे | उनकी संवाद पटुता का आतंक तो सम्प्रदायिक संसार मे सर्वत्र छाया हुआ था किन्तु कुरानी और किरानी उनकी अकाट्य युक्तियों का विशेषतः लोहा माने हुए थे | वे बडे मौलवीयों और पादरियों को तुरन्त निरुत्तर कर देते थे पादरियों मे तो कुछ परमत सहिष्णुता पाई जाती है , किन्तु इस्लामी भाई अपनी कट्टरता , तत्कालिक उत्तेजना और क्रोधाक्रान्तता के लिए जगव्दिख्यात है , इसलिए वे विवादों मे वहुधा कटूक्ति पर उतर आते थे और पं० लेखराम को मोहम्म्दी तलवार की धमकियां देने लगते थे , परन्तु पं० लेखराम प्राणों का मोह छोड कर सदा निर्भयतापूर्वक मुसलमानी मत की असारता दिखलाने से कभी पीछे न हटते थे और उनकी धमकियों का उत्तर वे यह दिया करते थे कि संसार के धर्म शहीदों के रुधिर से ही फूले फले हैं और मेइ अपनी जान हथेली पर लिए फिरता हूं |
उन्होने बहुत से सम्भ्रान्त सनातनी धर्मी समृद्ध कुलों को धर्मभ्रष्ट होने से बचाया था | उन में मुजफ्फर नगर जिला के जाट रईस चौ० घासीराम और सिन्ध के रईस दीवान सूरजमल और उनके दोनों पुत्रों के नाम उल्लेखनीय हैं |
पं० लेखराम भावुकता और धार्मिक क्ष्रद्धा की साक्षात मूर्ति थे | क्ष्री महात्मा मुंशीराम ने इस विषय मे उनके सम्बन्ध की एक मनोरंजक घटना लिखी है | एक बार प्रशंसित पं० जी जालान्धर मे ज्वरर्त्त होकर कन्या महाविद्दालय जालन्धर के संस्थापक क्ष्री लाला देवराज जी के बाग में ठहरे हुए थे | एक दिन महात्मा मुंशीराम जी आकर क्या देखते है कि लेखराम जी खट्वा पर पडे हांफ रहे है | उन्होने कारण पूछा तो उन्होने कहा लाला देवराज को बुलाइए | मै पीठ पीछे बात करना पाप समझता हूं | लाला देवराज जी बुलवाये गए तो पं० लेखराम जी ने क्रोध से कहा कि आपका गृह आर्यगृह नहीं है | अब मै यहां नही रहुंगा | महात्मा मुंशी राम जी ने बाग के माली से अनुसंधान किया तो ग्यात हुआ कि किसी ब्रह्मण्ब्रुव के नटखट और धुर्त बालक ने पं० जी को चिढाने के लिए अपनी शठतावश वैसे ही उनके सामने बाग के गमलों पर लिखे हुए 'ओ३म' पादत्राण (जूता) प्रहार किया था |पं० जी ज्वर चढे हुए ही उसको पकडने के लिए उसके पीछे भागते फिरे | फिर जब वह हाथ न आया तो वे थक कर हाफते हुए क्रोध से भरकर खट्वा पर पडे रहे | उन्होने लालादेवराज जी से कहा कि 'ओ३म' अक्षर युक्त गमलों को ऊंचे स्थानों मे धुर्त बालक की पहुंच से ऊपर क्यों नहीं रखवाया था | महात्मा मुंशी राम ने बहुत अनुनय - विनय करके उनको शान्त किया |
पं० लेखराम जी एक नि:स्पृह , त्यागी और सन्तोषशील ब्रह्मण के उत्तम उदाहरण थे | वे पंजाब आर्य प्रतिनिधि से निर्वाह मात्र २५/- और फिर ३५/- रु. मासिक लेकर दिनरात वैदिक धर्म की सेवा मे व्यस्त रहते थे उन का गृहस्थ जीवन भी ब्रह्मणोचित और उपदेशकों के लिए सर्वथा अनुकरणीय था | उन्होने शास्त्रोक्त रुद्रसंग्यक ब्रह्मचारी की अवश्था को प्रप्त होकर ३६ वर्ष की आयु मे ज्येष्ठ संवत १९५० मे मरी पर्वतान्तर्गत भन्न ग्राम निवाशिनी कुमारी लक्ष्मीदेवी के साथ अपना विवाह किया था और विवाह के अनन्तर ही अपनी पत्नी को पढाना आरम्भ कर दिया था | वे उसको धर्म प्रचार - कार्य मे भी स्वसहधर्मिणी बनाना चाहते थे | ग्रीष्म संवत १९५२ वि० में उनके पुत्र उत्पन्न हुआ , जिसका नामकरण वैदिक रीति से करके उन्होने 'सुखदेव' नाम रखा |पण्डित लेखराम को वैदिक धर्म की प्रचार धुन में पुत्र और पत्नी का कुछ भी ध्यान न रहता था | उनकी यह हार्दिक इच्छा थी कि उनकी पत्नी भी उन्ही की समान उपदेशिका बनकर भ्रमं करे | इस कार्य के अभ्यासार्थ वह बाल पुत्र सहित उसको भी यात्रा मे अपने साथ ले जाने लगे जिस का फल यह हुआ कि वह छोटा बालक अहर्निश की यात्रा के कष्टों को सहन न कर सका और उसने डेढ वर्ष की अवश्था मे रुग्ण होकर जालन्धर मे इस आसार संसार से विदा ली | पं० लेखराम ने बडी धीरता से पुत्र वियोग के दारुण दु:ख का सामना किया और वे पूर्ववत ही धर्म प्रचार - यात्रा मे तत्पर रहे |
उन्ही दिनों पंजाब की आर्य प्रतिनिधि सभा ने आर्य समाज के संस्थापक आचार्य महर्षि दयानन्द के प्रमाणिक चरित्र के लिखाने का बीडा उठाया और उसकी घटनाओं के अन्वेषणार्थ पं० लेखराम की नियुक्ति की गई | इस कार्य के लिए उन्होने जहां - तहां महर्षि के साक्षात्कार - प्राप्त पुरुषों से मिलकर उनके बतलाये हुए वर्णनों को उन्ही के शब्दों मे संग्रह किया |
पं० लेखराम मे ऐतिहासिक तत्त्वानुसन्धान की प्रवृत्ति बडी प्रबल थी | उन की ससीम विद्दासम्पत्ति को देखते हुए , जो काम वो इस विषय मे कर गये है , वह वस्तुतः विस्मयावह तथा श्लाघनीय है | वे फारसी और अरबी के अतिरिक्त अंग्रेजी आदि युरोपीय भाषाओं से, जिनमें आजकल इतिहास की सामग्रि प्रचुर परिणाम मे प्रस्तुत है , सर्वथा अनभिग्य थे और देववाणी में भी स्वल्प प्रवेश रखते थे , किन्तु वे अपने परिक्ष्रम के प्राचुर्य से इन न्युनताओं की पूर्ति कर लेते थे | अपने अग्यात भाषाओं के जिस किसी ग्रन्थ मे उनको किसी नवीन बात की सूचना मिलती थी , उसका अनुवाद वे अपने किसी मित्र से करा लेते थे | इन त्रुटियों की विद्दमानता मे यद्दपि उनका किया हुआ ऐतिहासिक संग्रह पुष्कल और प्रशंसनीय है, तथापि उसमें कहीं कहीं जो कुछ भ्रम व प्रमाद पाये जाते हैं वे सर्वथा क्षन्तव्य तथा उपेक्षणीय है | फिर ऐतिहासिक गवेषणा की क्रिया के फल के समान सदैव सर्वथा निर्भ्रान्त तथा एकान्त सत्य तो हो भी नहीं सकता , उस मे विचार - वैविध्य के कारण परिणामों की भिन्नता की भारी संभावना रहती है | इसलिए ऐतिहासिक अन्वेषणों के परिणामों मे परिवर्तन होते रहते हैं और आगे भी होते रहेंगे | हमको गत - गवेषणाओं से लाभ उठाते हुए किसी एक परिणाम का प्रबल पक्षपाती न बन कर सत्यान्वेषण मे सदैव प्रयत्नवान रहना चाहिए | पं० लेखराम की संगृहीत महर्षि दयानन्द की जीवनी में साक्षियों के शब्द - प्रतिशब्द - मौलिक और लिखित वर्णन ऐतिहासिक दृष्टि से बडे बहुमुल्य हैं | उन से ऐतिहासिक अन्वेषेक को ऊहापोहपुर्वक पक्षपातरहित सत्य पर पहुंचने में बडी सहायता मिलती है |
आर्यसमाज के संस्थापक आचार्य के चरित्र संग्रह व्दारा आर्य समाज के भूत इतिहास के अन्वेषण और स्वमौखिक और लिखित प्रचार के व्दारा उस के भावी इतिहास के निर्मान में अहर्निश यात्री बने हुए पूर्ण आर्य पथिक के अपने पद को सत्य सिद्ध करते हुए धर्म वीर पं० लेखराम के वैदिक धर्म पर बलिदान का समय समीप आ पहुंचा | मोहम्म्दी लोग पं० लेखराम से पहले ही से व्देश रखते थे | अन्होने उन पर दिल कुधाने और अस्लील लिखने के कई अभियोग मिर्जापुर , प्रयाग, लाहौर, मेरठ, दिल्ली, बम्बई की फौजदारी अदालतों मे दायर किये थे, किन्तु न्यायधीशों ने पं० जी के लेखों मे कोई बात भी आक्षेपयोग्य न पाकर उनकी तलबी किये बिना ही उन सब अभियोगों को खारिज कर दिया | इस से मुसलमान और भी चिढ गये और धर्म वीर पर उनके रोष की सीमा ना रही | उनकी ओर से पं० जी को वध की धमकियां मिलने लगीं | किन्तु पं० लेखराम भय का नाम ही नहीं जानते थे | वे जगत्पिता प्रभु की कल्याणी वाणी ' अभयं मित्रादभयममित्रात ' का अक्षरशः पालन करने वाले थे आर्यपुरुषों के सावधान करते रहने पर भी उन्होने कभी अपनी रक्षा का प्रयत्न नहीं किया |
अन्त को फरवरी सन १८९७ के मध्य भाग मे एक काला गठीले बदन का नाटा मुसलमान युवक उनके पास आया और उनसे अपने आप को हिन्दु से मुसलमान बना हुआ बतालाकरौसने अपने शुद्ध किए जाने की प्रार्थना की | धर्मवीर तो पतितों के उद्धार और शुद्धि के लिए प्रत्येक क्षण कटिवद्ध रहती थे | उन्होने उसको प्रेम पूर्वक अपने पास बिठलाया और धर्मोपदेश देना प्रारम्भ किया | उस मनुष्य की आंखों से भयंकरता बरसती थी | कई पुरुषों ने उनको उससे सुरक्षित रहने के लिए भी चेतावनी दी किन्तु उन्होने उस पर ध्यान नहीं दिया | एक दिन सायं काल के समय उसी दुष्ट मुसलमान ने अंगडाई लेते हुए पं० जी के उदर में ,जबकी वे महर्षि दयाननद की जीवनी में उनकी परम पद प्राप्ति के वर्णन का अध्याय अभी अभी लिख कर उठे थे , कटारी भौंक दी जिससे उनकी आंतों में आठ मारक घाव लगे और उनसे आधी रात तक बराबर रुधिर का प्रवाह बहता रहा | डा. पेरी , सिविल सर्जन के घावों को ,दो घण्टे तक सीते रहे फिर भी पं० जी न बच सके और उन्होने फाल्गुन सुदि ३, संवत १९५३ वि० तदनुसार ६ मार्च १८९७ ई० को रात्रि के दो बजे अपने नश्वर शरीर को वैदिक धर्म पर बलिदान कर किया | प्राण त्यागने के पूर्व तक उनकी चेतना मे तनिक भी अन्तर नहीं आया | वे बराबर ' ओ३म विश्वानि देव सवितर० ' इत्यादि और गुरु मन्त्र का पाठ करते रहे | उस समय उनको न घर वालों की चिन्ता थी न घातक पर अप्रसन्न्ता और न मौत का डर था | यदि चिन्ता थी तो आर्य समाज की और यदि ध्यान था तो उस महायग्य की ओर जो ऋषि दयानन्द रच गए थे | धर्मवीर ने न तो माता और धर्मपत्नी की चिन्ता की , क्योंकि उनको विश्वास था कि परमेश्वर उनका सहायक है और न ही घातक का पता लगाने को कहा क्योंकि जिस वैदिक धर्म के वे सच्चे सेवक थे , वह बदला लेने की शिक्षा नही देता | उन्होने अन्तिम आदेश अपने सहधर्मियों को यह दिया कि -
" आर्य समाज से लेख का काम बन्द नही होना चाहिए |"
इस प्रकार वैदिक धर्म पर बलिदान होकर पं० लेखराम जी जहां अपना नाम शहीदों की पंक्ति मे सदा के लिए अमर बना गए , वहां वे आर्यसमाज रूपी छोटे पौधे को अपने रुधिर का खाद देकर वृक्ष में परिणत होने के लिए हरी भरी और लहलहाती हुई अवश्था में छोड गए |धर्मवीर पं० लेखराम के जीवन की अन्तिम जवनिका यदि इस प्रकार न गिरी होती तो उनकी अर्थी के साथ ३०,००० के स्थान मे ३,००० जनता भी न जाती | उस अवश्था में आर्य समाज की परिमिति परिधि के बाहर उनको कोई न जानता , किन्तु महानुभाव भावुक हृदयों को पन्चभौतिक शरीर की अपेक्षा यशः शरीर अधिक प्रिय होता है और अपनी सबसे अधिक प्रियतम वस्तु धर्म के लिए वे सब कुछ न्यौछावर करने के
लिए सदा सन्नद्ध रहते है |धर्मवीर पं० लेखराम इसके उत्कृष्ट उदाहरण थे | पं० लेखराम जी के गुण कर्म और स्वभाव का वर्णन यदि एक वाक्य में करना हो तो वे अत्यन्त त्यागी , सरल स्वभाव, प्रतिग्या पालन के पक्के , तेजश्वी , मन्युप्रवण , आर्यसिद्धान्त के अटल विश्वासी , अकुतोभय , वाक्पटु , सुलेखक, और आदर्श धर्म प्रचारक थे | उनके रक्त बिन्दु पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरे | उन्होने सोमनाथ, वजीरचन्द, मथुरादास, तुलसीराम, सन्तराम, योगेन्द्रपाल , जगत सिंह आदि अनेक धर्माग्रि से प्रज्वलित हृदय वाले भावुक धर्मोपदेशक उत्पन्न किए थे और आशा है कि वे आगे भी ऐसे ही अदम्य उत्साह से परिपूर्ण प्रचारकों को जन्म देते रहेंगे |

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