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दयानन्द - बोधरात्रि

फाल्गुन बादि १३
विश्वविदित गुजरत देश में, टंकारा इक सुन्दर ग्राम |
उस में था औदिच्य ब्राम्हणों का, कुल बहुक्ष्रुत एक ललाम |
पुत्र लाल जी के कर्सन जी, थे उस के मुखिया अभिराम |
महादेव मे अविचल क्ष्रद्धा, उन की रहती आठों याम || १ ||
उन के कुल दीपक दयाल जी, थे जन्मे अति प्रतिभावन |
शिव रात्रि - व्रतपुजन में थे, पित्राग्या से क्ष्रद्धावान |
शिवमन्दिर मे निशि भर जागे, अटल ध्यान हो निष्ठावान |
पर शिवपिण्डी पर चुहे की, लीला देख रहे हैरान || २ ||
बोध हुआ उनको तब ही से, हो नहि सकता शिव पाषाण |
है यह जगती तल मे फैला, जड पदार्थ - पूजा अग्यान |
निराकार शिव की पूजा ही है, वेदोक्त सनातन - ग्यन |
इसी ग्यन की महिमा से वे दया नन्द बन गये महन || ३ ||
रुचिरा
उस ही दिन से शिवरत्रि भी बोधरात्रि विख्यात हुई |
बोधदान से आर्य जनों को, महिमा उसकी ग्यात हुई ||
पर्व रुप मे तब ही से वह, जनता मे सुप्रसिद्ध हुई |
उसे मना कर आर्य मण्डली, वास्तव - ग्यान - समृद्ध हुई ||

-पं० सिद्ध्गोपल कविरत्न

इस संसार मे नाना प्रकार की साधारण घटनायें सर्वसाधारण के समक्ष प्रति दिन होती रहती हैं, जन साधारण की दृष्टि मे वे कोई महत्व नहीं रखती | जनता एक छण मे उन पर दृष्टि पात करती है और दुसरे क्षण मे उनको भुल जाती है | किन्तु यही साधारण घटनायें महापुरुषों के जीवन मे महान परिवर्तन उत्पन्न कर देती है | इतिहास साक्षी है कि अति साधारण घटनाओं ने जगत में बडी बडी क्रान्तियां कर दी हैं |
साधारण रोगियों, वृद्धों, शवों, को ले जाते हुए रथियों और सन्यासियों को सहस्त्रों जन प्रतिदिन देखते हैं, किन्तु इन्ही साधारण दृश्यों ने शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ को वह बोध प्रदान किया जिसका प्रभाव संसार के आधे मनुष्यों पर अब तक विद्दमान है | इन्ही दृष्यों से उद्बुद्ध बुद्ध की दया ने करोडों प्राणियों की निर्दय रक्तपात से रक्षा करके संसार मे करुणा और सहानुभुति का स्रोत बहाया था |
वृक्षों पर से फलों को गिरते हुए नृत्य ही लक्षों मनुष्य देखते हैं, किन्तु आइजक न्युटन की दिव्य दृष्टि ने एक वृक्ष से फल के पतन को देखकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के नियम का साक्षात्कार किया |
बटलोई की भाप अपने उपर के ढक्कन को अनेक मनुष्यों के नेत्रों के सामने हिलाती रहती है , किन्तु न्युकोमेन की दूरगामिनी बुद्धि ही उसमे वर्तमान वस्प - इंजन का बीज देख सकी |
वृक्ष के पत्तों मे छनता हुआ सुर्य का आलोक बहुधा मनुष्यों की दृष्टि के सामने आता रहता है , किन्तु इटली निवासी पोटौ महानुभाव ने एक वृक्ष के नीचे मध्याह्न मे विक्ष्राम करते हुए इसी दृश्य को देखकर आलोक चित्र का मूल सिद्धान्त ढूंढ निकाला |
इसी प्रकार की एक घटना आज हमारे प्रस्तुत प्रकरण से सम्बन्ध रखती है , जिसने वर्तमान शताब्दी के भारत के धार्मिक इतिहास मे अपुर्व क्रान्ति उत्पन्न कर दी |
गुजरात प्रायदीप के मौरवी राज्य मे मछुकाटा के इलाके में टंकारा एक ग्राम है | सम्प्रति यह ग्राम सौराष्ट्रराज्य के अन्तर्गत है | उसमें गुजराती ब्रम्हणों की औदिच्य शाखा का दाल्भ्यगोत्रिय एक समृद्ध सामवेदी कुटुम्ब चिरकाल से वास करता था | उस की उपसंग्या त्रिवेदी थी | शिवपुराणोक्त शैव सम्प्रदाय में इस कुल की असीम आश्था थी | वह बडी भक्ति से कैलाशाधिपति महादेव की पुजा अर्चा में तत्पर रहता था और शवों के शिव रात्रि पर्व को बडे समारोह से मनाकर विधि अनुसार व्रत रखता था | पण्डित करसन जी लाल जी तिवारी इस कुटुम्ब का प्रथम पुरुष था | तिवारी त्रिवेदी पद का अपभ्रंश है और करसन जी के पिता का नाम लाल जी था | करसन जी के कई सन्ततियां थी | उनमें से उनके पुत्र का नाम मूलशंकर व दयाल जी था | दयाल जी बडा प्रतिभाशाली बालक था | ५ वर्ष की अवश्था में उस ने देवनगरी अक्षर सीख कर बहुत से स्तोत्र और श्लोक कण्ठाग्र कर लिये थे | आठवें वर्ष में उसका यग्यों पवीत संस्कार हुआ और वह अपने सम्प्रदायानुसार सन्ध्या - वन्दनादि कर्म करने लगा | उसके पिता ने सामवेदी ब्रह्मण होने पर भी रुद्राष्टाध्यायी से युक्त होने के कारण उसको यजुर्वेद कण्ठाग्र कराया था और पार्थिव पुजन आदि का उपदेश दिया था | चौदह वर्ष की अवश्था में दयाल जी को नियम पुर्वक शैव मत की दीक्षा देने की तैयारी की गयी और शिवरात्रि की महारात्रि का महापर्व इस के लिए चुना गया | गुजरात देश मे शिवरात्रि का पर्व माघ बादि १३ को होता है और उत्तर भारत मे फल्गुन बदि १४ को यह पर्व मनाया जाता है इस अन्तर का कारण यह है कि दक्षिण भारत में अमावश्यान्त और उत्तर भारत मे पुर्णिमान्त मास की गणना प्रचलित है | संवत १८९४ विक्रमी की शिवरात्रि को दयाल जी नियम पुर्वक व्रत रखकर रात्रि जगरण के लिए पिता के साथ ग्राम से बहर वर्तमान अपने कुल के शिव मन्दिर मे गया | रात्रि के प्रथमार्द्ध की पुजा के पश्चात उसके पिता आदि निद्रा के वशवर्ती हो गये , किन्तु क्ष्रद्धालु बालक दयाल जी भक्ति के आवेश मे आंखों पर जल की छींटे मार मार कर जगाता रहा | कुछ देर पश्चात वह क्या देखता है की एक मूषक ( बालक की मातृ - भाषा गुजराती में उसका नाम "औंधर" था ) शिव की पिण्डी पर आकर चढावे के अक्षत आदि खाने के लिए उछल - कूद मचाने लगा | दयाल जी के बाल - हृदय मे उसको देखकर शंकाओं का समुद्र उमड पडा | वह सोचने लगा कि शिव तो पुराण में विकराल गणो , पाशुपात अश्त्र और त्रिशूल से युक्त , वर और शाप देने में समर्थ , सर्वशक्तिमान वर्णित है | यह कैसे सम्भव है कि अपनी मुर्ति पर से वह इस चुहे को नहीं हटा सकता ? इस आशंका ने दीनदयाल जी तर्कणा शक्ति मे ऐसा आघात - प्रतिघात उत्पन्न किया की उसी क्षण से उस को पाषाण की पिण्डि के शिव न होने का निश्चय हो गया और उसने उसी समय सत्यशिव की गवेषणा का संकल्प धारण कर लिया | उस ने तत्काल अपने पिता जी को जगाया और अपनी शंका उनसे निवेदन की | उन्होने उस शंका के समाधान का नाना प्रकार से उद्दोग किया , किन्तु दयाल जी का सन्देह निवृत्त न हुआ , तब उस ने अपने मन में यह व्रत दृढ कर लिया कि मैं शिव का साक्षात्कार किये बिना उस का पूजन कदापि न करुंगा |
चुहे की इस छुद्र घटना ने ही दयाल जी के दयानन्द बनने का दूत्र पात किया | आगे की घटनावली केवल उसकी सहायक मात्र थी , वह क्रिया प्रतिक्रिया की क्रममात्र थी | वस्तुतः इस शिवरात्रि ने दयानन्द को बोध प्रदान किया था और वही दयानन्द के जीवन भर के मुर्ती पुजा के विरुद्ध विकट सन्ग्राम का आदि कारण थी | इस लिए उस को आर्य समाज के इतिहास मे " दयानन्द - बोधरात्रि " कहते हैं और आर्यसमाजिक परिवारों में उस दिन प्रत्येक वर्ष दयानन्द बोधरात्रि नाम का पर्व मनाया जाता है | शायद इस समय जबकी ऋषि दयानन्द के उद्दोग ने मुर्ति पुजा के विश्वास को जड से हिला दिया है , साधारण दृष्टि मे दयानन्द बोध रात्रि का उतना महत्व न जंचे , किन्तु आर्य समाज के आचार्य के कार्यक्षेत्र मे अवतीर्णा होने से पूर्व मुर्ति पुजा की दिशा पर जब हम दृष्टपात करते है तो दयानन्द बोधरात्रि के प्रभाव का पुर्ण चित्र हमारे हृदय पटल पर अंकित हो जाता है | उस समय मुर्ति पूजा के विरुद्ध एक शब्द का भी उच्चारण हिन्दू धर्म के मूल पर कुठाराघात समझा जाता था और ऐसा करने वालों को नास्तिक की उपाधि तत्काल मिलती थी | महाभारत युद्ध के पश्चात वेदानुयायियों में अनेक सिद्धान्तों पर मतभेद रखने वाले बहुत से मतप्रवर्तक उत्तपन्न हुए हैं किन्तु वेद के प्रमाणों के आधार पर मुर्ति पूजा के खण्डन का गौरव वेद के अव्दितीय भक्त , आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द को ही प्राप्त है | ऋषि दयानन्द के अविर्भाव से पुर्व मूर्तिपूजक जनता मूर्तियों को साक्षात उपास्य देव मानकर ही पूजती थी और अब तक सर्वसाधारण अग्यजनों की यही भावना है | किन्तु ऋषि दयानन्द के मुर्तिपूजा का प्रबल परिहार करने पर सनातनी पण्डितों ने इस नवीन युक्ति का आक्ष्रयण आरम्भ किया था कि मुर्तियां तो केवल चित्त की एकाग्रता का साधन मात्र है | वे मूर्ति पूजा के अर्थ " मूर्ते: पूजा = मूर्ति की पुजा " छोड कर " मूर्तौ पूजा = मूर्ति मे पुजा " करने लगे | परन्तु दयानन्द की दीर्घ दृष्टि ने खूब ताड लिया था कि ये युक्तियां पूजारियों के द्रव्यापहरण के हथकण्डे है और अपने अनुयायियों की बुद्धियों को जड बनाये रखने का साधन मात्र है | ऋषि दयानन्द ने भले प्रकार अनुभव कर लिया था कि इस समय मुर्तियों के मन्दिर दुराचार के दुर्गम दुर्ग बने हुए है | अधिकांश मादक द्रव्य सेवी मूर्खों , भंगडियों , गज्जडियों और मद्दपों को काली , भैरव और महादेव के मंदिरों मे ही शरण मिलती है और वहीं उनका जमाव रहता है | स्वेच्छाचारी और अनाचारी महन्तों की सम्पत्तिशीलता के साधन भी यही मन्दिर हैं | इसलिए जब तक इनकी जड मूर्ति पूजा का उन्मूलन भारत से न होगा , तब तक यथार्थग्यान के प्रसार और भारत माता के उद्धार की आशा दुराशामात्र है | इसी विचार परम्परा ने महर्षि दयानन्द को मूर्ति पूजा के घोर विरोध के लिए उद्दत है और कटिवद्ध किया था और उसका परिणाम आपके नेत्रों के सामने स्पष्ट उपस्थित है कि चाहे हमारे पैराणिक भाई अपने मुख से स्वीकार करें व ना करें पर अन्तः करण मे वे इसको भली प्रकार जानते है कि साक्षर जनता का विश्वास मूर्ति पुजा से उठ चुका है |इतना तो सनातनी पंडित भी अवश्य कहने लगे हैं कि मुर्ति पुजा केवल अग्यानियों के लिए है , ग्यानियों को उसकी अवश्यकता नहीं है | क्या यह धार्मीक जगत में बोधरात्रि की हुई महाक्रान्ति नहीं है कि जिस मूर्ती पूजा की जड को महमूद गजनवी क खड्ग , औरंगजेब का अत्याचार अपने बल से न हिला सका था उसको महर्षि दयानन्द के प्रबल तर्क तथा प्रचार ने मृदुतापूर्वक खोखला कर दिया | अब समझदार सनातनी भी मुर्ति मन्दिर निर्माण की निरर्थकता को भले प्रकार समझ गये है और वे भी स्थान स्थान पर विद्दालय , ऋषिकुल , ब्रह्मचर्याक्ष्रम , स्कूल और कॉलेज खोल रहें है | ये बातें दर्शा रही हैं कि आर्य संतान वास्तविक मन्दिरों के स्वरूप को जान गई है और उस स्वरूप को उनके समक्ष लाने वाला दयानन्द ही था |
बोधरात्रि का वृतान्त दयानन्द के व्रत की दृढता का भी सूचक है उस ने केवल १४ वर्ष की वाल्यावस्था मे जो व्रत ग्रहण किया था , उस को अजीवन निभाया | मूर्ति खण्डन छोड देने के लिये उसको नाना प्रकार के प्रलोभन और भय दिखलाये गए , किन्तु वह अपनी प्रतिग्या पर अटल रहा | उदय पुर राज्य की घटना आर्य सामाजिक पुरुषों को ग्यात ही होगी कि उनके शिष्य उदयपुराधीश्वर महाराणा सज्जनसिंह ने उन से निवेदन किया था कि उदय पुर का राज्य एक लिन्गेश्वर महादेव के मन्दिर के आधीन है | यदि आप यहां मुर्ति पूजा का खण्डन न करें तो इस मन्दिर की गद्दी आप को मिल सकती है , जिससे आपका कई लाख रूपए पर अधिकार हो जायेगा | यह सुनकर श्वामी जी को बहुत क्रोध आया और उन्होने कहा कि " तुम मुझ को तुच्छ लालच देकर बडे बलवान ईश्वर की आग्या तुडवाना चाहते हो | यह छोटी सी रियासत और उस का मन्दिर कि जिस मे से मै एक दौड से बाहर जा सकता हूं , मुझे कभी भी वेद और ईश्वर की आग्यां के तोडने पर बाधित नहीं कर सकते |" ( इस उक्ति पं० मोहन लाल , विश्णुलाल पण्ड्या की बतलाई हुई पं० लेखराम जी आर्य पथिक संगृहीत महर्षि की जीवनी मे दी हुई है |) यह सुनकर महाराणा साहब ने उनके धार्मिक भाव से चकित होकर निवेदन किया कि " महाराज मैने यह सब इसलिए कहा था कि मै देखूं कि आपके खण्डन पर कितने दृढ हैं ? अब मेरा निश्चय पहले से बहुत अधिक दृढ हो गया है कि आप वेद की आग्या पालने में दृढ हैं |) ऐसे ही दृढताव्रती और अविचलित निश्चयी पुरुषों से संसार का कल्याण होता है , जो बाल्यावस्था में ही दयानन्द और बुद्ध आदि के समान साधारण घटनाओं से भी बोध प्राप्त करके अविद्दान्धकार को हटाकर ग्यान ज्योति का प्रसार करते रहते हैं |
आर्य महाशयों को दयानन्द बोधरात्रि से यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि प्रत्येक पुरुष का कर्त्तव्य है कि वह साधारण घटनाओं को भी अन्तर्दृष्टि से अवलोकन करने का अभ्यासी बने और अपने अंगीकृत व्रत को प्राणपण से पालता रहे | दयानन्द बोधरात्रि को प्रत्येक आर्य के यहां ऋषि दयानन्द के गुणों का कीर्तन होना चाहिए |

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