स्त्रि जाति को विधाता ने ललित, दिव्य, मृदु और मधुर गुणों की राशि बनाया है | इन गुणों का जैसा विकास नारी जाति में होता है, वैसा अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता | नारी दया का अवतार, प्रेम की परम धारा, सौन्दर्य की प्रतिमा, मधुरता की मुर्ति है | वह संसार का मूल है और गृहस्थाक्ष्रम की जीवनशक्ति है | इसलिए देववाणी - साहित्य में नारी को दीवी शब्द समादृत किया गया है और दया आदि मन के जितने कोमल और उच्च भाव है, उन क श्ब्दमात्र में स्त्रीलिंग से ही निर्देश किया गया है | नारी को नर का खान कहा गया है | संसारियों का संसार, गृहस्थियों की गृहस्थता, सुकर्मियों के सुकर्म और धर्मात्माओं के सब धर्मों का स्रोत नारी है |
जिस नारी जाति की इतनी महिमा है, सभ्य समूहों में जिस का इतना समादर है, उसमें आदि सृष्टि से समस्त संसार में सर्वोत्कृष्ट और आदर्श रुप में, किस देवी ने इस वसुन्धरा को अपने जन्म से पवित्र किया था यह प्रश्न मानव - समाज की शिक्षा के लिये इतिहास की दृष्टि से अत्यावश्यक और महत्वपुर्ण है | इस के उत्तर के लिए सारे संसार के प्राचीन और अर्वाचीन स्त्री - रत्नों के चारु चरित्रों की तुलनात्मक दृष्टि से जांच पडताल की जाय तो सर्वसम्मति से एक ही नाम निर्धारित होगा और वह तत्त्वाग्यानी - शिरोमणि मिथिलाधिपति राजर्षि विदेह जनक की आत्मजा और सूर्यकुल कमलदिवाकर मर्यादापुरुषोत्तम महाराज रामचन्द्र की धर्मपत्नि सती - शिरोमणि क्ष्री सीता जी का प्रातः स्मरणीय पवित्र नाम है | भुत काल में तो क्ष्री सीता की समता करने वाली कोई नारी दिखाई ही नहीं देती, किन्तु भविष्य भी उनकी समकक्षा को उत्पन्न कर सकेगा, इसमें सन्देह है | बडे - बडे क्रान्तिदर्शी महाकवियों की प्रतिभा खोज करते करते थक गई, किन्तु उसको क्ष्री सीता जी की उपमा न मिल सकी | इसलिए आदि कवि वाल्मीकि ने क्ष्री सीता जी को अनुपमा कहा है | क्या सरलता में, क्या सुशीलता में क्या सच्चरित्रता में और क्या पतिपरायणता में, सभी विषयों में सीता देवी अव्दितीय थीं |
"होनहार बिरवान के होत चीकने पात" इस लोकोक्ति के अनुसार सीतादेवी बाल्यावस्था से ही होनहार थीं | यह उनके जन्मजन्मान्तरों के सुकृत्यों का फल और सौभाग्य था कि उनका महाराज जनक जैसे अध्यात्मतत्ववेत्ता तथा धर्मात्मा पिता के यहां जन्म हुआ था | महाराज जनक अपने समय में आध्यात्मविद्धा में ऐसे निष्णात माने जाते थे कि ब्रम्हजिग्यासु ऋषिमुनियों की मन्डली ग्यानचर्चा के लिए उनको सदैव घेरे रहती थी और वे निष्काम भाव से रज्य व्यवहार चलाते हुए भी जल में उत्पन्न कमलपत्र के समान संसार से पृथक रहते थे | ऐसे सर्व गुणसम्पन्न राजर्षि जनक की आत्मजा क्ष्री सीता सर्वगुणों की खान क्यों न होती !
यद्द्पि वाल्मीकि रामायण और पुराणों में क्ष्री सीता जी को जानकी, वैदेही, जनकात्मजा और जनकसुता पदों से जनक की पुत्री बतलाते हुए भी उनको अयोनिजा कहा गया है और उन के सीता नाम को लेकर उन की उत्पत्ती के विषय मे एक यह अलौकिक कथा वर्णन की गई है कि यतः वे सीता यग्य में हल चलाते हुए महाराजा जनक को पृथ्वी में सीता मिलीं थी इसलिए उनका नाम "सीता" पडा था | परन्तु इस कथा का ऐतिहासिक और मानवीय दृष्टि से तत्वानुसन्धान किया जाये तो उसमे तथ्यांश इतना ही प्रतीत होता है की महाराज जनक के सीता यग्य के अवसर पर ही उनका जन्म होने के कारण उनका नाम "सीता" रखा गया था | संसार मे और भी ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध होते हैं, जिनमे किन्ही विषेस अवसरों पर उत्पन्न बालकों के नाम उन अवसरों के नाम परही रखे गये हैं | इस शताब्दी के काशी के प्रशिद्ध ज्योतिषी महामहोपाध्याय क्ष्री पं० सुधाकर व्दिवेदी के "सुधाकर" नामकरण का यह कारण था की उनके जन्म के समय पत्रवाहक काशी से प्रकाशित सुधाकर समचार पत्र उन के पिता के पास लाया था, उन्होने उसी नव प्राप्त पत्र के नाम पर अपने नवजात भ्रातृज का नाम सुधाकर रख दिया था |
क्ष्रीमती सीता जी के "सीता" नामकरण का हेतु भी उनकी सीता यग्य के अवसर पर हुई उत्पत्ति ही होसकती है, क्योंकि सीतायग्य के अवसर पर उनका आविर्भाव तो सर्ववादिसम्मत ही है | केवल भुमि में उनका प्रादुर्भाव विवादास्पद है | भुमि में किसी मानवीय शरीर का प्रादुर्भाव सृष्टिक्रम के सर्वथा विरुद्ध और इतिहास के नितान्त विपरीत है |
बाल्यकाल को अतिक्रमण करके कैशोरावस्था मे पदार्पण करने पर क्ष्री सीता जी के सद्गुणों का सौरभ दशों दिशाओं में व्याप्त होने लगा | राजर्षि जनक जहां अपनी पुत्री की कीर्ती सुन कर बहुत प्रसन्न होते थे, वहां अब उनके मन मे इस चिन्ता का भी आविर्भाव होने लगा की सीता अपनी सारीरिक और मानसिक सम्पत्ति - अपने सौन्दर्य, बल, विद्दा और बुद्धि के अनुरूप ही किसी योग्य पुरुष क्ष्रेष्ठ की सहधर्मिणि तथा धर्मपत्नी बने | सौभाग्य से उन्हे राम जैसा नररत्न मिल गया | क्ष्री सीता जी अपने पति के साथ अयोध्या जाकर आनन्दपूर्वक रहने लगीं |
वृद्ध होने पर महाराज दशरथ ने अपने ज्येष्ठ और सर्वगुण क्ष्रेष्ठ पुत्र क्ष्री रामचन्द्र जी को युवराज पद पर अभिषिक्त करना चाहा, किन्तु एक कुटिला दासी मन्थरा के बहकाने से उनकी छोटी रानी कैकेयी के दुराग्रहवश उनको क्ष्री रामचन्द्र जी को राज्य न देकर चौदह वर्ष का वनवास देना पडा | क्ष्री रामचन्द्र पिता की आग्या को शिरोधार्य करके अपने अनुज लक्ष्मण सहित वन को सिधारे | पतिपरायणा सतीशिरोमणि सीता जी ने भी प्राणप्रिय पति के पदों का अनुसरण किया और राजधानी अयोध्या के राजप्रसादों के राजोचित्त सुखैश्वर्यभोग की अपेक्षा पती की सेवा मे रहकर वनस्थली के कठोर भूमिशयन और कन्द, मूल तथा फल के भोजन को अधिक आनन्दप्रद माना | वे वहां अनसुया आदि ऋषि - पत्नियों के सत्संग मे प्राकृतिक शोभा का निरीक्षण करते हुए पति की सेवा में रत रहती थीं |
राक्षसराज रावण सीता की सुन्दरता से आकृष्ट होकर संन्यासी के रूप में क्ष्री राम और लक्षमण की अनुपस्थिति में पंच्चवटी से क्ष्री सीता को बलात हर ले गया और उनको लंका लेजाकर अपनी अषोकवाटिका में बन्दी बनाकर रक्खा | क्ष्री रामचन्द्र जी लक्षमण सहित चिन्तातुर होकर क्ष्री सीता को वन वन मे खोजते फिरे और उन्होने पम्पाधिपति वानर - वंशी सुग्रीव से मित्रता करके उस्के सेनापति अतुलबलधारी हनुमान के व्दारा क्ष्री सीता का लंका में पता पाकर सुग्रीव की वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण किया और अपनी रणपटुता और शस्त्रविद्धाकौशल से वानर कहलाने वाले वनवासियों को सुशिक्षित सेना मे परिणत करके उनसे रावण की युद्धाभ्यासी राक्षससेना को पराजित किया तथा मयावी रावण का उस के कुटिल कुटुम्ब सहित वध करके अपनी प्राणप्रिय धर्मपत्नी को उसके बन्धन से छुडाया |
दुष्ट रावण के पंजे में फस कर सीता ने अपने धर्म की रक्षा जिस आत्मिक बल से की, उस का उदाहरण अन्यत्र मिलना असम्भव है | रवण ने उनको अनेक प्रलोभन दिए और नाना प्रकार की यातनायें देकर बहुत कुछ डराया - धमकाया, परन्तु वे अपने धर्म से लेश्मात्र भी विचलित नहीं हुईं | "धर्मो रक्षति रक्षितः " के अनुसार अन्त मे धार्म ने ही उनकी रक्षा की और "पद्दपत्रमिवाम्भसा" के सेमान वे पापपक्ङ् के स्पर्श से विशुद्ध रहीं | लंका का राज्य रवण के अनुज विभीषण को देकर और क्ष्री सीता को लेकर अपने वनवास की अवधि बीतने पर क्ष्री रमचन्द्र लक्षमण सहित अयोध्या लौटे और अपने पैतृक राजसिंहासन पर आरुढ होकर उत्तर कौशल की प्रजा का पालन करने लगे | उन के रज्य मे प्रजा ऐसी सुखी थी की अब भी उनके उत्तम रज्य को "रामराज्य" कह कर पुकरा जता है | प्रजानुर्ज्जन ही वे अपना कर्तव्य समझते थे |
भगवती सीता देवी की पावनी जीवनी प्रत्येक भारतीय कुल - ललना के लिये आदर्श स्वरूप है | वह आजकल के भोगवासनालोलुपता और अधिकारप्रियता के प्रगाढ अन्धकार के प्राकृतिक युग मे ज्योति के स्तम्भ का का काम देती है | दैहिक सुधोपभोग ही इस का उद्देश्य नहीं है, किन्तु यह सम्बन्ध दो आत्माओं का शाश्वतिक सम्बन्ध होता है जो जन्म जन्मान्तर तक अविच्छिन्न रहता है | इसलिए वैदिक आदर्शानुसार पति व पत्नि के मरणा पर पुनर्विवाह निषिद्ध है | आर्य शास्त्रो में विवाह का प्रयोजन रतिसुख नहीं बतलाया गया, किन्तु धर्म पालन के लिए ही वह सम्वन्ध किया जाता है और इसी लिए पत्नि को धर्मपत्नी कहते है , जिसमे शब्दशास्त्र के नियम से "अश्वघासादिवत तादर्थ्यसमास" होता है , जिस का अर्थ यही है , जो धर्म पालने के लिए पत्नी बनायी जाये वह "धर्मपत्नी" कहलाती है | सती शिरोमणि सीता का जीवन इस आदर्श का ज्वलन्त उदाहरण है |
पद्धति
क्ष्री सीताष्टमी पर्व की पद्धति भी अन्य वीर पर्वों और जयन्तियों के गृह्म और समाजिक कृत्यों के अनुसार है, परन्तु सामान्य - प्रकरण की पद्धति के पश्चात निम्नलिखित मन्त्रों व्दारा दो आहुति अधिक दी जायें -
अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समज्जनम |
अन्तः कृणुष्व मां हृदि मन इत्रौ सहासति || १||
अभि त्वा मनुजातेन दधामि मम वाससा |
यथासो मम केवलो नान्यासां कीर्तयाश्चन ||२||
-अथर्व० ७| ३६,३७|१||
यह पर्व विशेषतः भारत की कुल देवियों के शिक्षा ग्रहण के लिए उद्दिष्ट और अभिप्रेत है , इसलिए इस मे उन को विशेष भाग लेना चाहिए और उसका सारा प्रबन्ध उन्ही के हाथों मे होना चाहिए | इस अवसर पर पर्व के आनन्दवर्धनार्थ कन्याओं के बालोंद्दानादि मनोरज्जक क्रीडाओं की आयोजना होनी चाहिए |