-- पं सिद्धगोपाल काव्यतीर्थ
जितने काल में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा पूरी करती है, उस को एक 'सौर वर्ष' कहते हैं और कुछ लम्बी वर्तुलाकार जिस परिधि पर पृथ्वी परिभ्रमण करती है, उस को 'क्रांतिवृत्त ' कहते हैं | ज्योतिश्यो द्वारा इस क्रांतिवृत्त के १२ भाग कल्पित किये हुए हैं और उन १२ भागो के नाम उन-उन स्थानों पर आकाशस्थ नक्षत्रपून्जो से मिलकर बनी हुई कुछ मिलती-जुलती आकृति वाले पदार्थो के नाम पर रख लिए गए हैं | यथा - १ मेष, २ वृष, ३ मिथुन, ४ कर्क, ५ सिंह, ६ कन्या, ७ तुला, ८ वृश्चिक, ९ धनु, १० मकर, ११ कुम्भ, १२ मीन |
प्रत्येक भाग वा आकृति ' राशि ' कहलाती है |जब पृथिवी एक राशि से दूसरी राशि मे संक्रमण करती है तो उसको संक्रान्ति कहते है |लोक मे उपचार से पृथिवी के संक्रमण को सूर्य का संक्रमण कहने लगे है | छः मास तक सूर्य क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर उदय होता रहा है | प्रत्येक छः मास तक दक्षिण की ओर निकलता रहता है | प्रत्येक षण्मास की अवधि का नाम ' अयन ' है | सूर्य के उत्तर की ओर उदय की अवधि को ' उत्तरायण ' और दक्षिण की ओर उदय की अवधि को 'दक्षिणायन ' कहते है | उत्तरायण काल मे सूर्य उत्तर की ओर से उदय होता हुआ दिखता है और उसमे दिन बढता जाता है और रात्रि घटती जाती है | दक्षिणायन मे सूर्योदय दक्षिण की ओर दृष्टिगोचर होता है और उसमे रात्रि बढती जाती है और दिन घटता जाता है | सूर्य की मकर राशि की संक्रान्ति से उत्तरायण और कर्कसंक्रान्ति से दक्षिणायन प्रारम्भ होता है | सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण विशेष महत्वशाली माना जाता है | अतएव उत्तरायण के आरम्भ दिवस मकर की संक्रन्ति को भी अधिक महत्व दिया जाता है और स्मरणातीत चिरकाल से उस पर पर्व मनाया जाता है | यद्यपि इस समय उत्तरायण परिवर्तन ठीक-ठीक मकर संक्रान्ति पर नही होता और अयन-चयन की गति बराबर पिछली ओर को होते रहने के कारण इस समय (संवत १९९४ वि. मे) मकर संक्रान्ति से २२ दिन पूर्व धन राशि के ७ अंश २४ कला पर ' उत्तरायण ' होता है | इस परिवर्तन को लगभग १३५० वर्ष लगे है परन्तु पर्व मकर संक्रान्ति के दिन ही होता चला आता है, इसमे सर्वसाधारण की ज्योतिष-शास्त्रानभिग्यता का कुछ परिचय मिलता है, किन्तु शायद पर्व का चलते न रहना अनुचित मानकर मकर-संक्रान्ति के दिन ही पर्व मनाने की रीति चली आती हो |
मकर-संक्रान्ति के अवसर पर शीत अपने यौवन पर होता है | जनावास, जंगल, वन, पर्वत सर्वत्र शीत का आतंक छा रहा है, चराचर जगत शीतराज का लोहा मान रहा है, हाथ-पैर जाडे से सिकुड जाते है, ' रात्रौ जानु दिवा भानुः ' रात्रि मे जंघा और दिन मे सूर्य, किसी कवि की यह उक्ति दोनो पर आज कल ही पूर्ण रूप से चरितार्थ होती है | दिन की अब तब यह अवस्था कि सूर्य देव उदय होते ही अस्ताचल के गमन की तैयारिया आरम्भ कर देते थे, मानो दिन रात्रि मे लीन ही हुआ जाता था | रात्रि सुरसा राक्षसी के समान अपनी देह बढाती ही चली आती थी | अन्त को उसका भी अन्त आया | आज मकर-संक्रान्ति के मकर ने उसको निगलना आरम्भ कर दिया | आज सूर्यदेव ने उत्तरायण मे प्रवेश किया | इस काल की महिमा संस्कृत-साहित्य मे वेद से लेकर आधुनिक ग्रन्थ पर्यन्त सविशेष वर्णन की गयी है | वैदिक ग्रन्थो मे उसको ' देवयान ' कहा गया है और ग्यानी स्वशरीर त्याग तक की अभिलाषा इसी उत्तरायण मे रखते है | उनके विचारानुसार इस समय देह त्यागने से उनकी आत्मा सूर्य लोक मे होकर प्रकाश मार्ग से प्रयाण करेगी | आजीवन ब्रह्मचारी भीष्म पितामह ने इसी उत्तरायण के आगमन तक शर-शय्या पर शयन करते हुए प्राणोत्क्रमण की प्रतीक्षा की थी |ऐसा प्रशस्त समय किसी पर्वता (पर्व बनने) से कैसे वंचित रह सकता था | आर्य जाति के प्राचीन नेताओ ने मकर-संक्रान्ति ( सूर्य की उत्तरायण संक्रमण तिथि ) का पर्व निर्धारित कर दिया |
जैसा कि पूर्व बतलाया जा चुका है कि यह पर्व चिरकाल से चला आता है | यह भारत के सभी प्रान्तो मे प्रचलित है, अतः इस को एकदेशी ना कहकर सर्वदेशी कहना चाहिये | सब प्रान्तो मे इस के मनाने की परिपाटी मे भी समानता पाई जाती है | सर्वत्र शीतातिशय निवारण के उपचार प्रचलित है |
वैद्यक शास्त्र मे शीत के प्रतीकार तिल, तेल, तूल( रुई ) बतलाये है | जिस मे तिल सबसे मुख्य है | इसलिये पुराणो मे इस पर्व के सब कृत्यो मे तिलो के प्रयोग का विशेष माहात्म्य गाया गया है और उन को पापनाशक कहा गया है | किसी पुराण का निम्नलिखित वचन प्रसिद्ध है--
अर्थ- देश, काल, और पात्र के अनुसार ही दिया हुआ दान ' सात्त्विक ' कहलाता है | तथा -
अर्थ- हे अर्जुन ! दरिद्रों का पालन करो, धनियों को धन मत दो |
इस श्रीमद्भगवत्गीता के वचनों के अनुसार इस प्रबल शीतकाल में मकर-संक्रान्ति के पहले दिन लोढी का तेवहार मनाने की रीति है | इस अवसर पर स्थान-स्थान पर होली के समान अग्नियां प्रज्वलित की जाती है और उन मे तपे हुए गन्ने की भूमि पर पटका कर आनन्द मनाया जाता है | उस के अगले दिन वहां मकर-संक्रान्ति का भी उत्सव होता है, जिस को वहां 'माघी' बोलते हैं | ज्यात होता की ये दोनो दिन के लगातार दो उत्सव ना होकर दिनद्वयव्यापी मकर-संक्रान्ति महोत्सव के एक ही पर्व का अपभ्रष्ट रूप है | देश के आर्यसामाजिक पुरुषों को चाहिये कि वे दो दिन तेवहार न मनाकर मकर-संक्रान्ति की तिथि को ही परिमार्जित रूप में इस पर्व को मनाएं और आर्य सामाजिक जगत् में पर्वों की एकाकारता स्थापित करने में सहायक हों |
गृह्यकृत्य-मकर-संक्रान्ति के दिन सामान्य पर्व पद्धति में प्रदर्शित विधानानुसार गृह के परिमार्जन, शोधन तथा लेपन के पश्चात् नवीन शुद्ध स्वदेशी वस्त्र-परिधान पूर्वक सपरिवार सामान्य हवन करें | जिस के साकल्य में तिल और शर्करा का परिणाम प्रचुर होना चाहिए और आहुतियों की मात्रा स्वसामर्थ्यानुसार बढा देनी चाहिये | निम्नलिखित हेमन्त और शिशिर ऋतुओं की वर्णनपरक ऋचाओं से विशेष आहुतियां दी जायें |
--यजु. १४|२७||
--यजु. १५|५७||
तत्पश्चात तिल के लड्डू (तिलवे) होम यज्य में समागत पुरुषों को हुतशेष के रूप में समर्पण किये जायें और स्ववित्तानुसार कम्बल सहित दीन-दुखियों को दान दिए जायें |
सामाजिक कृत्य अपराह्न में सब आर्य सामाजिक पुरुष किसी प्रशस्त क्षेत्र में एकत्रित होकर दण्ड, बैठक और रस्सा खेंचना आदि के व्यायामों का प्रदर्शन करके उत्सव के आनन्द की वृद्धि करें |